श्रीमद् भागवत कथा : मन में दृढ निश्चय और ह्रदय में आत्मविश्वास हो तो भगवान की प्राप्ति संभव




न्यूज़ स्ट्रोक
आगरा, 23 सितम्बर। गिरधर कॉलोनी, न्यू लोहिया नगर बल्केश्वर में चल रही श्रीमद् भागवत कथा के तीसरे दिन शनिवार को कथा व्यास रमेश चंद्र शास्त्री ने, भक्त ध्रुव, प्रहलाद और भगवान के वामन अवतार की कथा का बेहद रोचक वर्णन किया।



कथा व्यास ने कहा कि भक्त ध्रुव की कथा ने इस बात को सिद्ध किया कि कैसे एक छोटा बालक भी दृढ़ निश्चय और कठोर तपस्या के बल पर भगवान को धरती पर आने को विवश कर सकता है। जो बालक अपने पिता के प्यार के लिए तरस गया उसे भगवान ने स्वयं सर्वोच्च स्थान प्रदान किया। 5 साल के बालक ध्रुव की तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान ने कहा, मेरे प्रिय भक्त ध्रुव, मैं तुझे वह निश्चल ( ध्रुव ) स्थान देता हूँ जो सूर्य, चंद्र आदि ग्रहों, सभी नक्षत्रों और सप्तर्षियों से भी ऊपर है।ध्रुव के नाम से ही उस दिव्य लोक को संसार में ध्रुव तारा के नाम से जाना जाता है। रमेश चंद्र शास्त्री ने कहा कि  ध्रुव का मतलब होता है स्थिर, दृढ़, अपने स्थान से विचलित न होने वाला जिसे भक्त ध्रुव ने सत्य साबित कर दिया। भक्त ध्रुव की कहानी से हमें ये शिक्षा मिलती है कि जिसके मन में दृढ निश्चय और ह्रदय में आत्मविश्वास हो वह कठोर पुरुषार्थ के द्वारा इस संसार में असंभव को भी संभव कर सकता है।
वामन अवतार के रूप में भगवान विष्णु ने राजा बलि को यह शिक्षा दी कि दंभ तथा अंहकार से जीवन में कुछ भी हासिल नहीं होता और यह भी बताया कि यह धनसंपदा क्षणभंगुर होती है। इसलिए इस जीवन में परोपकार करों। उन्होंने कहा कि अहंकार, गर्व, घृणा और ईर्ष्या से मुक्त होने पर ही मनुष्य को ईश्वर की कृपा प्राप्त होती है। यदि हम संसार में पूरी तरह मोहग्रस्त और लिप्त रहते हुए सांसारिक जीवन जीते है तो हमारी सारी भक्ति एक दिखावा ही रह जाएगी।
कथा के दौरान वामन अवतार की झांकी दिखाई गई। शनिवार को राधा अष्टमी होने के कारण कथा स्थल  बच्चे राधा की भूमिका में भी नजर आए। कथा का पंडाल पूरी तरह राधा में हो गया। इसके अलावा अजामिल की कथा का भी वर्णन किया गया। प्रहलाद चरित्र की कथा सुनाते हुए कहा कि भक्त प्रहलाद का चरित्र युवाओं के लिए हमेशा से प्रेरणादायक है। पुत्र आस्थावान, गुणवान और ज्ञानवान हो तो माता-पिता के साथ गुरु भी गौरवान्वित और प्रफुल्लित महसूस करला है। भागवत कथा में प्रहलाद चरित्र पुत्र एवं पिता के संबंध को प्रदर्शित करता है और बताता है कि यदि भक्त सच्चा हो तो विपरीत परिस्थितियां भी उसे भगवान की भक्ति से विमुख नहीं कर सकता। भयानक राक्षस प्रवृत्ति के हिरण्यकश्यप जैसे पिता को प्राप्त करने के बावजूद भी प्रहलाद ने अपनी ईश्वर भक्ति नहीं छोड़ी और सच्चे अर्थों में कहा जाए तो प्रहलाद द्वारा अपने पुत्र होने का दायित्व भी निभाया गया। वर्तमान समय में युवा इस रास्ते से भटक रहे हैं। जिन्हें भक्त प्रहलाद के चरित्र का अनुशरण करना चाहिए। आचार्य ने कहा कि पुत्र का यह सर्वोपरि दायित्व है कि यदि उसका पिता कुमार्गगामी और दुष्ट प्रवृत्ति का हो तो उसे भी सुमार्ग पर लाने के लिए सदैव प्रयास करने चाहिए। प्रहलाद ने बिना भय के हिरण्यकश्यप के यहां रहते हुए ईश्वर की सत्ता को स्वीकार किया और पिता को भी उसकी ओर आने के लिए प्रेरित किया। किंतु राक्षस प्रवृत्ति के होने के चलते हिरण्यकश्यप प्रहलाद की बात को कभी नहीं माना। ऐसे में भगवान नरसिंह द्वारा उसका संघार हुआ।उसके बाद भी प्रहलाद ने अपने पुत्र धर्म का निर्वहन किया और अपने पिता की सद्गति के लिए ईश्वर से प्रार्थना की।



 इस अक्षर पर कथा परीक्षित  संतोष अग्रवाल-मधु अग्रवाल, निर्मल अग्रवाल,  सुशील गोयल, अमित अग्रवाल, राहुल उपाध्याय, आयुष अग्रवाल,  अमन गुप्ता, लक्की,  समीर नाथ अग्रवाल, दीपक अग्रवाल,  परसित गुप्ता आदि मौजूद रहे। 

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