आगरा समर क्रिकेट कैंप : क्रिकेट सीखने का वो दौर अब सिर्फ किस्सों में

 

🏏कभी गर्मियों की सुबहों में बैट-बॉल की आवाज से गुलजार रहते थे मैदान

 🏏डॉ. एसबीएस चौहान और निशात हुसैन के बाद अब महसूस हो रही है खालीपन की टीस

न्यूज़ स्ट्रोक 
आगरा, 23 मई, 2026। एक समय था जब गर्मियों की छुट्टियां शुरू होते ही आगरा के क्रिकेट मैदानों में अलग ही रौनक दिखाई देती थी। सुबह की पहली किरण के साथ बच्चे कंधे पर किट बैग टांगे मैदानों की ओर दौड़ पड़ते थे। आरबीएस कॉलेज ग्राउंड, सेंट जॉन्स कॉलेज और आगरा कॉलेज के मैदानों पर घंटों तक बल्ले और गेंद की आवाज गूंजती रहती थी। लेकिन समय के साथ यह परंपरा धीरे-धीरे धुंधली पड़ गई। आज शहर में क्रिकेट एकेडमियों की संख्या तो बढ़ गई है, मगर पुराने दौर वाले समर क्रिकेट कैंप अब लगभग गायब हो चुके हैं। 
हालांकि कुछ क्रिकेट एकेडमी अब भी कैंप लगाती हैं लेकिन विशुद्ध रूप से जो समर कैंप लगते थे और फिर साल भर के लिए शांत हो जाते थे, उस तरह के कैंप अब गुजरे जमाने की बात हो चुकी है।
आगरा के क्रिकेट प्रेमियों के लिए सबसे बड़ी पहचान हुआ करती थी अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट कमेंटेटर और शिक्षाविद् डॉ. एसवीएस चौहान का आरबीएस क्रिकेट कैंप। वहीं डॉ. ख्वाजा निशात हुसैन द्वारा सेंट जॉन्स कॉलेज और आगरा कॉलेज मैदान पर लगाए जाने वाले कैंप भी शहर की क्रिकेट संस्कृति का अहम हिस्सा थे। इन कैंपों में सैकड़ों बच्चों ने क्रिकेट की शुरुआती शिक्षा ली और आगे चलकर शहर व प्रदेश स्तर पर अपनी पहचान बनाई। सेंट जॉन्स में कैंप की शुरुआत मधुसूदन मिश्रा, समीर चतुर्वेदी और निशांत हुसैन ने की। वर्षों तक कैंप चला। जीत सिंह इसके साथ जुड़े। इसके अलावा अरुण खंडेलवाल, सर्वेश भटनागर, अनिल अग्रवाल समेत तमाम सीनियर क्रिकेटर यहां कोच के रूप में जुड़े। बाद में समीर चतुर्वेदी और मधुसूदन मिश्रा ने विविधा सनराइज क्रिकेट एकेडमी शुरू की और कैंप भी लगाए। एक दो अन्य कैंप भी लगते थे लेकिन बच्चों को इंतजार इन्हीं दो कैंप का रहता था।
गर्मियों की छुट्टियों में ये कैंप बच्चों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं होते थे। जिन बच्चों के पास पूरे साल किसी एकेडमी में प्रशिक्षण लेने का अवसर नहीं होता था, उनके लिए ये समर कैंप किसी ‘क्रिकेट टॉनिक’ की तरह साबित होते थे।
भारतीय क्रिकेटर और आगरा के दिग्गज भी इन कैंप में पहुंचते थे
इन कैंपों की खास बात यह थी कि यहां सिर्फ क्रिकेट नहीं सिखाई जाती थी, बल्कि अनुशासन, टीम भावना और खेल भावना का पाठ भी पढ़ाया जाता था। शहर के कई वरिष्ठ और अनुभवी क्रिकेटर बिना किसी स्वार्थ के बच्चों को प्रशिक्षण देने मैदान में उतरते थे। दर्जनों कोच और पूर्व खिलाड़ी घंटों नेट्स पर बच्चों को बल्लेबाजी, गेंदबाजी और फील्डिंग की बारीकियां समझाते थे। सीनियर क्रिकेटर और विविधा क्रिकेट अकादमी के अध्यक्ष समीर चतुर्वेदी ने बताया कि चेतन चौहान, चेतन शर्मा, राजदिंर सिंह हंस, सुरेंद्र खन्ना समेत तमाम दिग्गज क्रिकेटर सेंट जॉन्स और आरबीएस कैंप में उद्घाटन के समय, कोचिंग के समय और समापन के वक्त बच्चों का हौसला बढ़ाते रहे।
प्रशिक्षण भी और खेलने को मैच भी 
इसके अलावा कैंप से टीम बनाकर मैच खिलाए जाते थे। निशात हुसैन तो एकेडमी के तहत टूर्नामेंट का आयोजन भी करते थे।  उस दौर में एक-एक कैंप में 100 से लेकर 150 तक बच्चे हिस्सा लेते थे। गर्मियों की सुबहें मैदानों की चहल-पहल से जीवंत हो उठती थीं। अभिभावक भी अपने बच्चों को लेकर उत्साहित रहते थे क्योंकि उन्हें कम खर्च में बेहतर प्रशिक्षण और अनुभवी मार्गदर्शन मिल जाता था।
आगरा के लोकप्रिय क्रिकेट कमेंटेटर नरेंद्र शर्मा ने बताया कि आरबीएस समर कैंप ने प्रथम रणजी ट्रॉफी खिलाड़ी देने का गौरव हासिल किया था, जसबीर सिंह के रूप में।
लेकिन समय के साथ तस्वीर बदल गई। डॉ. एसवीएस चौहान और डॉ. ख्वाजा निशात हुसैन के निधन के बाद इन कैंपों की परंपरा लगभग थम सी गई। उनके जाने के बाद जो खालीपन पैदा हुआ, उसे आज तक कोई भर नहीं पाया।
दरअसल अब क्रिकेट अब धीरे-धीरे पूरी तरह व्यावसायिक होता जा रहा है। मैदानों का रखरखाव, क्रिकेट किट, कोचिंग और सुविधाओं का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में अलग से एक महीने के समर कैंप आयोजित करना आसान नहीं रह गया है।
सबसे ज्यादा असर उन बच्चों पर पड़ा है जो प्रतिभाशाली तो हैं, लेकिन सालभर की महंगी एकेडमी फीस देने में सक्षम नहीं। पहले ऐसे बच्चों को समर कैंप के जरिए मौका मिल जाता था, मगर अब उनके लिए रास्ते सीमित होते जा रहे हैं।
शहर के पुराने क्रिकेट प्रेमी मानते हैं कि आगरा की क्रिकेट संस्कृति को जिंदा रखने के लिए फिर से ऐसे समर कैंप शुरू होने चाहिए। उनका कहना है कि यदि प्रशासन, स्कूल-कॉलेज और पूर्व क्रिकेटर मिलकर पहल करें, तो आगरा की क्रिकेट विरासत को दोबारा जीवंत किया जा सकता है। क्योंकि क्रिकेट सिर्फ खेल नहीं, बल्कि शहर की उस खूबसूरत परंपरा का हिस्सा रहा है जिसने हजारों बच्चों के सपनों को उड़ान दी।

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