-फुटवियर पर जीएसटी दर बढ़ाने से निराश उद्यमी
न्यूज़ स्ट्रोक
आगरा, 30 जून। पहले से ही आर्थिक संकट का सामना कर रहे जिले के जूता उद्योग के लिये जीएसटी में बढ़ोतरी कंगाली में आटा गीला करने जैसा है। चंडीगढ़ में बुधवार को सम्पन्न हुई जीएसटी परिषद की बैठक में फिनिश्ड चमड़े पर जीएसटी की दर पांच से बढ़ा कर 12 प्रतिशत करने का निर्णय ले लिया गया।
देश में 65 प्रतिशत जूतों की आपूर्ति करने वाले घरेलू उद्योग और निर्यात में 27 प्रतिशत की भागीदारी निभाने वाले निर्यातकों के लिये यह दोहरी मार है। घरेलू जूता उद्योग से जुड़े उद्यमी एक हजार रुपये से कम कीमत के जूतों से जीएसटी हटाने या फिर केवल पांच प्रतिशत रखे जाने की मांग को लेकर आंदोलन भी कर चुके हैं।
शू फैक्टरर्स फेडरेशन के अध्यक्ष गागन दास रामानी ने बताया कि 2017 में जीएसटी लागू करते समय एक हजार रुपये तक के वस्त्रों पर पांच प्रतिशत जबकि 500 रुपये तक के फुटवियर पर पांच प्रतिशत कर लागू किया और तो और 1000 रुपये से अधिक मूल्य के वस्त्रों पर कर 12 प्रतिशत जबकि 500 रुपये से अधिक मूल्य के फुटवियर 18 प्रतिशत कर लगाया गया। हमारे कई बार प्रतिवेदन और भेंट वार्तालाप के परिणाम स्वरूप 1000 रुपये तक के फुटवियर पर कर पांच प्रतिशत तक कया गया। जीएसटी काउंसिल की सितंबर 2021 की लखनऊ बैठक में फिर से टैक्सटाइल और फुटवियर पर एक जनवरी 2022 से कर की दर पांच से 12 प्रतिशत प्रस्तावित की गई, जिसे जीएसटी काउंसिल की एक विशेष बैठक बुलाकर सिर्फ टैक्सटाइल पर रोल बैक करके पुन: पांच प्रतिशत किया गया तथा फुटवियर से सौतेला व्यवहार किया गया।
गागन दास ने कहा कि कच्चे माल, पैकिंग मेटेरियल व जूते, चप्पल रखने के लिए प्रयोग होने वाले बाक्स में लगभग 25 प्रतिशत की बढ़ोतरी होने से जूते की लागत बढ़ चुकी है। ऐसे में जीएसटी की मार फुटवियर कारोबार को रसातल में ले जाएगी।
अन्य जूता कारोबारियों का कहना है कि लागत बढऩे का सीधा असर उत्पादन पर पड़ा है। हालात यह हैं कि जिस जूते की फैक्ट्री में प्रतिदिन एक हजार जूते की जोड़ी बनती थी, वह अब सिर्फ 200 से 250 तक ही सीमित रह गई है। जूते का कारोबार कम होने में जीएसटी की भी मुख्य भूमिका रही है। जानकार मानते हैं कि यही हाल रहा तो इस उद्योग पर चीन का कब्जा हो जायेगा।


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