मुकेश उपाध्याय
नई दिल्ली, 20 जनवरी। हाल ही में नितिन नबीन को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) का निर्विरोध नया राष्ट्रीय अध्यक्ष चुन लिया गया। उनके नामांकन के सामने कोई अन्य नेता नहीं आया। पार्टी के लिए यह कदम स्थायित्व और संगठनात्मक अनुभव का प्रतीक माना जा रहा है। लेकिन इस प्रक्रिया ने राजनीतिक विश्लेषकों और आम पाठकों के बीच एक सवाल फिर से उठा दिया है: क्या भाजपा के संगठन में सचमुच लोकतंत्र है, या शीर्ष नेतृत्व पहले से सब तय कर देता है?
भाजपा के संगठन में अध्यक्ष का चयन हमेशा चर्चा का विषय रहा है। लालकृष्ण आडवाणी, जिन्होंने लंबे समय तक पार्टी का नेतृत्व किया, उनका चुनाव संगठन के भीतर बड़े हद तक संतुलित और निष्पक्ष माना जाता था। लेकिन इसके बाद नितिन गडकरी, जे.पी. नड्डा, और अब नितिन नबीन का चयन अधिकतर शीर्ष नेतृत्व की सहमति से तय होता दिखाई देता है। इसमें प्रमुख भूमिका निभाते हैं पार्टी के संरक्षक नेता जैसे अमित शाह और राजनाथ सिंह, और सबसे ऊपर पार्टी की धुरी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, जिनकी मंशा और निर्णय अक्सर अंतिम निर्णय के रूप में सामने आते हैं।
इस प्रक्रिया में विरोधी उम्मीदवारों का नामांकन लगभग नगण्य होता है। पिछले अनुभवों से यह साफ दिखाई देता है कि जब शीर्ष नेतृत्व किसी नाम पर सहमत होता है, तो कार्यकर्ता या संभावित दावेदार सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पाते। इससे संगठनात्मक लोकतंत्र केवल नाम मात्र का रह जाता है। पार्टी के भीतर ‘लोकतंत्र’ शब्द का अर्थ कभी-कभी ऐसा लगता है जैसे “ऊपर से तय निर्णय को औपचारिकता देने का लोकतंत्र।”
भाजपा के आलोचक कहते हैं कि यह प्रक्रिया पार्टी में अनुशासन और एकजुटता बनाए रखने के बहाने लोकतंत्र की परतें हटा देती है। कार्यकर्ताओं की भागीदारी केवल संकेतात्मक रह जाती है। कभी-कभी यह हल्का कटाक्ष भी उत्पन्न करता है: जैसे भाजपा में अध्यक्ष का चुनाव ‘रेस’ नहीं, बल्कि ‘निर्णय की घोषणा समारोह’ है।
दूसरी ओर, बड़े राजनीतिक दलों में नेतृत्व के निर्णय से संगठन की स्थिरता और रणनीति को मजबूती मिलती है। नरेंद्र मोदी, अमित शाह और राजनाथ सिंह जैसे अनुभवी नेता इसे एक जरूरी ‘सुरक्षा जाल’ के रूप में देखते हैं। परंतु यह संतुलन चुनौतीपूर्ण है—जहां एक ओर संगठन को मजबूत बनाना जरूरी है, वहीं लोकतांत्रिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और खुलापन भी उतना ही महत्वपूर्ण है।
नितिन नबीन का चयन पार्टी के लिए रणनीतिक रूप से समझदारी भरा कदम हो सकता है। लेकिन इससे यह सवाल अनुत्तरित रह जाता है कि क्या भारतीय राजनीतिक दलों में संगठनात्मक लोकतंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह गया है, या इसके वास्तविक मायने अभी भी सक्रिय हैं। जब तक चयन प्रक्रिया पूरी तरह से खुली और पारदर्शी नहीं होगी, भाजपा में ‘लोकतंत्र’ केवल शीर्ष नेतृत्व की सहमति से तय होने वाला खेल ही बनकर रह जाएगा।
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