नाम बड़े, नतीजा छोटा: गिल की कप्तानी, कोहली का भार और भारत की अधूरी वनडे टीम




नई दिल्ली, 19 जनवरी। घरेलू मैदान पर न्यूज़ीलैंड से वनडे सीरीज़ हारना भारतीय क्रिकेट के लिए सिर्फ एक पराजय नहीं, बल्कि एक असहज सच्चाई का सामना है। यह हार बताती है कि भारतीय टीम अब भी नामों की ताकत पर चल रही है, संरचना और संतुलन पर नहीं।
कप्तान शुभमन गिल के हाथ में यह सीरीज़ एक परीक्षा थी—और परीक्षा में अंक कटे हैं। कप्तानी में न तो आक्रामक सोच दिखी, न ही मैच को पलटने वाले फैसले। गेंदबाज़ी में न्यूज़ीलैंड की साझेदारियाँ बनती रहीं और भारतीय टीम देखती रही। यह अनुभव की कमी नहीं, निर्णय लेने में झिझक का मामला है।
विराट कोहली ने एक बार फिर साबित किया कि संकट में भारत आज भी उन्हीं की ओर देखता है। उनका शतक क्लासिक था, लेकिन यही भारतीय क्रिकेट की सबसे बड़ी चिंता भी है—2026 में भी टीम का भार एक खिलाड़ी पर क्यों? कोहली आउट होते ही पूरी बल्लेबाज़ी का ढांचा ढह जाना किसी भी मजबूत टीम की पहचान नहीं हो सकती। विराट कोहली के अलावा केवल राहुल ने ही बताया कि वह टीम की अहम् कड़ी है।
रोहित शर्मा जैसे सीनियर खिलाड़ी से उम्मीद थी कि वह कप्तान न होने के बावजूद पारी को दिशा देंगे, लेकिन उनकी भूमिका सीमित और असरहीन रही। अनुभव तब मूल्यवान होता है, जब वह टीम को स्थिरता दे—सिर्फ नाम भर होना काफी नहीं।
मिडिल ऑर्डर इस सीरीज़ में भारतीय हार का सबसे बड़ा गुनहगार रहा। न जिम्मेदारी, न धैर्य, न साझेदारी। इसके उलट न्यूज़ीलैंड ने बिना शोर किए वही किया, जो वनडे क्रिकेट की बुनियाद है—स्थिति के हिसाब से खेल।
यह हार चेतावनी है। अगर भारतीय क्रिकेट अब भी व्यक्तिगत प्रतिभा के भरोसे चलेगा और कप्तानी को सीखने की प्रयोगशाला बनाएगा, तो बड़े टूर्नामेंटों में नतीजे भी ऐसे ही आएंगे।

न्यूज़ीलैंड ने भारत को उसकी असली कमजोरी दिखाई
भारत–न्यूज़ीलैंड वनडे सीरीज़ के कल समाप्त होते ही भारतीय क्रिकेट एक असहज दौर में खड़ा नज़र आता है। घरेलू परिस्थितियाँ, अनुभवी खिलाड़ी और मजबूत नाम—सब होने के बावजूद सीरीज़ हार जाना इस बात का संकेत है कि टीम के भीतर बहुत कुछ ठीक नहीं है। कप्तान शुभमन गिल के लिए यह सीरीज़ सीख से भरी रही, लेकिन मैदान पर फैसलों की कमी साफ दिखी। गेंदबाज़ी में भी कहानी नई नहीं थी। शुरुआती ओवरों में असर के बाद डेथ ओवर्स में योजना बिखर गई। अतिरिक्त रन, ढीली फील्डिंग और स्पष्ट रणनीति की कमी ने न्यूज़ीलैंड को निर्णायक बढ़त दिलाई।
न्यूज़ीलैंड ने न आक्रामक बयान दिए, न सितारों का शोर मचाया—बस साझेदारियाँ बनाईं, दबाव बढ़ाया और मौके भुनाए। यही अंतर सीरीज़ का फैसला बन गया।
यह हार भारतीय क्रिकेट को आईना दिखाती है—कि अब नाम नहीं, नया संतुलन और स्पष्ट रणनीति चाहिए। अगर यह सबक समय पर नहीं सीखा गया, तो आने वाले बड़े मंच और कठिन हो सकते हैं।

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