'शादी योग्य लड़की की उम्र 18 से बढ़ाकर 21 साल करने के केंद्र सरकार के प्रस्ताव के बाद कहीं प्रश्न उठ रहे तो कहीं स्वागत हो रहे हैं। लड़का-लड़की बराबर हैं तो ऐसा क्यों कि लड़के 21 साल की उम्र में शादी के लिए तैयार होते हैं और लड़कियां महज़ 18 साल की उम्र में शादी की ज़िम्मेदारी उठाने को तैयार हो जाती है? लड़कियों का शरीर 18 की उम्र में मां बनने के लिए तैयार हो जाता है. तो क्या वो मानसिक रूप से भी मां बनने को तैयार है?' ऐसे तमाम प्रश्नों पर आगरा की सर्वाधिक चर्चित युवा समाजसेवी और सोशल काउंसलर सोनी त्रिपाठी का नजरिया
| सोनी त्रिपाठी |
सरकार के इस प्रस्ताव का युवा महिलाओं ने ही नहीं बल्कि कई महिला अधिकार संगठनों ने भी यही कहकर स्वागत किया है कि इससे लड़कियों को बराबरी का मौका मिलेगा, वे ज्यादा पढ़ पाएंगी, नौकरी कर पाएंगी और अपना करियर बेहतर ढंग से बना पाएंगी।
हालांकि सरकार के प्रस्ताव के बाद से ही भारतीय समाज और राजनीतिक गलियारों में इसको लेकर बहस छिड़ गई है। कई नेता इसके खिलाफ हैं। बीते दिनों कुछ सांसदों और खापों ने इस प्रस्ताव के विरोध में बयान दिया। दूसरी ओर अगर हम सरकारी आंकड़ों पर दृष्टि डालें तो पता चलता है कि कानूनी प्रावधानों के बावजूद भारत में महिलाओं की शादी होने की औसत उम्र बढ़कर 22.1 साल हो ही गई है लेकिन 20 से 24 साल की उम्र की 23.3 प्रतिशत महिलाओं की शादी अभी भी 18 साल से पहले हो जाती है।
प्रधानमंत्री मोदी नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2020 को लाल किले से लड़कियों की शादी की उम्र बढ़ाने की बात कही थी। उनका कहना सही भी था की बेटियों को कुपोषण से बचाने के लिए जरूरी है कि उनकी शादी सही उम्र में हो। कुछ लोग कहते हैं कि जब 18 साल की उम्र में लड़कियां वोट डालकर सरकार चुनने में मदद कर सकती हैं तो शादी क्यों नहीं कर सकती? निश्चित तौर पर लोग इस पर अपने तर्क वितर्क पेश करेंगे।
मैंने एक समाजसेवी के तौर पर, एक सोशल काउंसलर के तौर पर यह स्पष्ट रूप से देखा है कि 18 साल की उम्र में लड़कियों की मानसिक स्थिति इतनी डिवेलप नहीं होती है कि वह 18 उम्र में शादी के बाद दूसरे परिवार को भी समझ सके या उस घर को भी वह भली-भांति सुचारू रूप से चला सके। यूं तो इसके अपवाद भी हो सकते हैं लेकिन आज माननीय न्यायालय के समक्ष गृह क्लेश व घरेलू हिंसा मामले में इजाफा हुआ है। कम उम्र में शादी से लड़कियां घर की व्यवस्थाएं बैठाने में पूरी तरह से मानसिक रूप से तैयार नहीं होती हैं। कई मामलों में तो डिलीवरी के समय में लड़कियां लड़कियों की जान तक चली जाती है।
इस संशोधन पर सही समय पर प्रधानमंत्री जी ने निर्णय लिया है। इससे लड़कियों को इससे परिपक्व होने का मौका मिलेगा। वह घर और परिवार के साथ ही खुद को भी संभाल सकेंगी। शादी की आयु 18 वर्ष होने की वजह से लड़कियों का विवाह भी चोरी छुपे किया जाता था अब 21 वर्ष आयु होने की वजह से ऐसे कर पाना मुश्किल होगा। अब सरकार को बाल विवाह निषेध कानून स्पेशल मैरिज एक्ट और हिंदू मैरिज एक्ट में संशोधन करना चाहिए। वैसे 1978 में शारदा एक्ट के तहत उस समय लड़कियों के लिए विवाह की आयु सीमा 15 से 18 किया गया था। इसके लिए शारदा एक्ट के तहत 1920 में बदलाव भी किया गया था।
एक ओर "मैटरनल मोर्टालिटी" रेट को कम करने के लिए बराबरी के हक तक की बात कही जा रही है तो वहीं दूसरी और लड़की की पसंद की शादी और "एज ऑफ कंसेंट" को लेकर डर भी जाहिर हो रहा है। अगर हम देखें तो हर सिक्के के दो पहलू भी होते हैं। ठीक उसी तरह इस बात को भी दोनों पक्ष हमारे सामने है।
सरकार के इस संशोधन के पीछे सुप्रीम कोर्ट का एक यह फैसला भी हो सकता है, जिसमें कोर्ट ने कहा था कि वैवाहिक बलात्कार यानी मैरिटल रेप से बेटी को बचाने के लिए बाल विवाह को पूरी तरह से अवैध माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने विभाग के लिए न्यूनतम उम्र के बारे में फैसला लेने का काम सरकार पर छोड़ दिया था। बाल विवाह की सूरत में लड़की दिमागी रूप से सारी संबंधों के लिए तैयार नहीं होते कई बार उसकी खुद की सारी की स्थिति इतनी अच्छी नहीं होती है कि पति की ख्वाहिशों को पूरा कर सके। ऐसे में कई बार उसके साथ जोर जबरदस्ती का तरीका अपनाया जाता है जिसके चलते लड़की के मान सम्मान को ठेस तो पहुंचती है।
वैसे भी दुनिया भर के 125 से अधिक देशों के बाहर की न्यूनतम आयु लड़की और लड़के की समान है। ऐसे में सरकार का यह कदम सकारात्मक हो सकता है।

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